अतीत की कैद या भविष्य की आजादी?

क्या हमारा जीवन अतीत में घटी घटनाओं से तय होता है, या उन घटनाओं पर दी गई हमारी प्रतिक्रिया से?
क्या आपने कभी इस विचार पर ध्यान दिया है कि यदि अतीत ही सब कुछ तय करता, तो एक जैसे दुःख और संघर्ष झेलने वाले दो लोगों का जीवन एक जैसा क्यों नहीं होता? कोई व्यक्ति टूट जाता है, तो कोई उसी दर्द को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेता है।
इसलिए अतीत एक घटना हो सकता है, हमारी पहचान नहीं।
ठीक वैसे ही जैसे किसी कार्य में असफल होना हमारी पहचान नहीं बन जाता। वह केवल हमारी यात्रा का एक हिस्सा होता है। असफलता हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर बनने के लिए आती है।
अतीत की घटनाएँ हमें अनुभव देती हैं, हमें सिखाती हैं, हमारी सोच को परिपक्व बनाती हैं, लेकिन वे हमारा भविष्य तय नहीं करतीं। भविष्य का निर्माण हमारे आज के निर्णय और कर्म करते हैं।
कई बार कैद बाहर की नहीं, भीतर की होती है। वह हमारे मन में बैठी हुई आवाज़ होती है, जो बार-बार कहती है—”तुम यह नहीं कर सकते”, “अब बहुत देर हो चुकी है”, या “तुम्हारे बस की बात नहीं है।” यह आवाज़ वास्तव में हमारे भीतर कैद हो चुकी पुरानी घटनाओं की होती है, जो हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम जीवन में केवल एक जगह ठहरने के लिए आए हैं, या निरंतर आगे बढ़ने के लिए?
एक जहाज़ का लंगर उसे कुछ समय के लिए स्थिर रखने के लिए होता है। यदि उसी लंगर को हमेशा के लिए समुद्र की तह में गाड़ दिया जाए, तो क्या वह जहाज़ कभी अपनी मंज़िल तक पहुँच पाएगा? बिल्कुल नहीं। उसी प्रकार अतीत भी केवल एक पड़ाव होना चाहिए, स्थायी ठिकाना नहीं।
सच्ची आज़ादी तब शुरू होती है, जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन वर्तमान को बेहतर बना सकते हैं और भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
“अतीत हमारी स्मृति है, वर्तमान हमारी शक्ति है और भविष्य हमारी संभावनाएँ हैं।”
यदि हमारा समाज केवल अपने अतीत की सीमाओं में कैद रहता, तो शायद हम आज एक स्वतंत्र देश के नागरिक नहीं होते। हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति भी पहले जैसी नहीं रही। एक समय था जब उन्हें शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था और न ही घर से बाहर निकलने की स्वतंत्रता।
लेकिन कुछ साहसी और दूरदर्शी महिलाओं ने उस सोच को चुनौती दी। जैसे सावित्रीबाई फुले। यदि उन्होंने स्वतंत्र सोच और साहस के साथ आगे बढ़ने का निर्णय न लिया होता, तो शायद आज शिक्षा का अधिकार इतने व्यापक रूप में हमारे समाज तक नहीं पहुँच पाता।
हम सभी अपने अतीत को अपने साथ लेकर चलते हैं। लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या हम उससे सीख रहे हैं, या केवल उसे अपने कंधों पर बोझ बनाकर ढो रहे हैं?
क्योंकि कैद और आज़ादी के बीच केवल एक दरवाज़े का ही अंतर नहीं होता, कई बार यह अंतर हमारी दृष्टि का भी होता है।
अब मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ—
क्या आप अभी भी अपने अतीत में कैद हैं, या उससे आज़ाद होकर उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ रहे हैं?
अपने अनुभव और विचार मेरे साथ अवश्य साझा करें। यह भी बताइए कि इस लेख में आपको क्या सबसे अच्छा लगा, किन बातों से आप सहमत हैं, और आपको कहाँ लगता है कि मैं और बेहतर लिख सकती हूँ। आपकी हर राय मेरे लिए महत्वपूर्ण है।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

मौन का शोर

“शोर “- अक्सर हम जब इस शब्द को सुनते हैं, तो हमारे मन में विचार ये आता है कि किसी से विवाद , भीड़ या चीख पुकार । पर क्या अपने कभी किसी मौन शोर को सुना है,ये वो शोर है जो हमें बाहरी आवाज या बाहरी दुनिया में सुनाई नहीं देता।

ये शोर हमारे अंदर ही अंदर एक तूफान में चलता रहता है। ये हमें सुनाई तब देता है जब चारों तरफ सन्नाटा हो। शायद इसी वजह से हम बाहरी शोर को तो सुन लेते है और उस पर ध्यान देते हैं, पर जो हमारे भीतर तूफान चल रहा है उस पर हम ध्यान नहीं देते , क्यों कि उसको सुनने के लिए हमें शांति चाहिए जो अक्सर इस भाग – दौड़ भरी जिन्दगी में हमें मिलती ही नहीं।

या यूँ कहें कि हम अपना ये शोर सुनना ही नहीं चाहते । क्यों कि ये शोर इतना खामोश होता हैं। जिसको कहने के लिए हमें शब्दों की जरूरत ही नहीं होती हैं, बल्कि ये शोर हमारी चुप्पी बन जाता है

अक्सर समाज ने हमें बताया जो शांत रहते हैं, या जो कम बोलना पसंद करते हैं,वो कायर होते हैं या वो हर चुके हैं।

असल में मौन होना या शांत होना कमजोरी नहीं होती है, और न ही कम बोलना ये हमारी आत्मसंयम और परिपक्वता , साथ ही सही समय पर सही शब्दों का चयन करने की रणनीति होती है। कई परिस्थितियों में हमारा शांत होना ही हमारे विद्रोह को दर्शाता है।

शांत होना ही हमारी सबसे बड़ी ताकत होती है,जो हमें इतना मजबूत बना देती है,कि हम अब किसी और के इशारों पर बात नहीं करते । न ही कोई बिना हमारी मर्जी के हमसे कोई प्रतिक्रिया ले सकता है।

ये शोर अक्सर हमें देर रातों को जागने पर सुनाई देता है,जब सारी दुनिया सो रही होती है तब कमरे में हमें एक खामोश शोर सुनाई देता है,जो हमारी ही आवाज होती है,वो आवाज जो शांत होने पर इतनी मजबूत हो जाती है ,जो दुनिया से लड़ने या समाज के सामने खड़े होने का साहस देती है।

और जब हम बोलना शुरू करते हैं,तो सब हमारी बातों में छिपे उस सन्नाटे को सुनते है,ओर यही हमारी असली ताकत बन जाती है।

मौन का अर्थ यह कतई नहीं है कि आपके पास कहने के लिए कुछ नहीं है; इसका अर्थ है कि आपने यह समझ लिया है कि हर बात हर किसी के समझने के लायक नहीं होती। अपने भीतर के इस शोर को बहने दें, इसे खुद में संजोएं। जैसा कि कहा गया है—’मौन वह भाषा है जिसमें सत्य की सबसे गहरी बातें कही जाती हैं।’ जिस दिन आप अपनी चुप्पी की शक्ति को पहचान लेंगी, उस दिन आपको बाहरी शोर की पुष्टि की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। बस याद रखें, जो नदियाँ गहरे शोर के साथ बहती हैं, वे ऊपर से शांत ही दिखाई देती हैं।”

क्या आप मेरे इस विचार से सहमत हैं,क्या आप अपने भीतर चल रहे खामोश शोर के तूफान को सुन प रहे हैं,अगर हां तो परेशान न हो,बस यही समय आपको मजबूत बनाएगा ,यही तूफान आपको ताकत देगा ,इसके लिए खुद को तैयार कीजिए , और हमें भी अपनी राय दीजिए कि।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

आप सभी का धन्यवाद कि आप मेरे आर्टिकल को पड़ रहे हैं।“मेरे प्रिय पाठकों, मैं समाज में बदलाव के इस सफर में आप सभी को शामिल करना चाहती हूँ। आप मुझे ईमानदारी से बताएं कि आपको मेरे आर्टिकल कैसे लग रहे हैं? क्या ये आपकी सोच में कोई बदलाव ला रहे हैं?”आपकी एक राय मुझे एक हौसला देगी अपने इस नए सफर में आगे बढ़ने का।

“परंपरा – बेड़ियाँ या प्रगति ?”

चलिए आज हम कुछ ऐसा लेकर आए हैं, कि देखते है कितने लोग मेरे इन विचारों से सहमत हैं।ओर कितने लोग सहमत नही हैं।

“परंपरा “ये शब्द तो हम सब अपने बचपन से ही सुनते आए हैं, कभी दादी तो कभी नानी या फिर अपने ही परिवार के अलग – अलग सदस्यों से।

परंपरा जो हमें अपने मूल जड़ों से जोड़े रखती है, चाहें त्यौहार के रूप में,या किसी और अलग रूप में। ये हमें हमारी संस्कृति से मिलाती है,हमें ये महसूस कराती हैं कि हम कितने गौरवान्वित है कि हम इस संस्कृति में जन्मे हैं।

ये वो अदृश्य धागे होते है जो हमें दिखाई तो नहीं देते, लेकिन हमें एक दूसरे से जोड़े रखते हैं। हर समुदाय या हर देश की अलग – अलग परंपरा होती हैं। जो हमें एक दूसरे को मिलने पर एक दूसरे से जुड़ने में अलग ही अनुभव कराती हैं। और हां ये हमारे पूर्वजों के अनुभव भी होती हैं जो हमारी आज की भाग दौड़ बाली जिंदगी में भी अपनों का एहसास दिलाती हैं।

पर कुछ परंपरा हमारे बदलते जीवन के साथ बदलाव भी चाहती हैं, अगर हम ऐसा नहीं करते तो यही परंपरा हमारी प्रगति में बाधा भी बन जाती हैं।

खासकर के हमारे मध्यम वर्गीय समाज में तो ज्यादातर परंपरा महिलाओं या लड़कियों से जुड़ी होती हैं,जो उनके लिए बेड़ियां बन जाती हैं। उनके सपनों ओर उनकी उड़ान में, उनकी स्वतंत्रता में सामने एक दीवार बन कर खड़ी हो जाती हैं।

ऐसी परंपराओं को समय के साथ बदलना चाहिए ,जो हमारे समाज के सबसे अहम दो वर्ग को जकड़े न रखे। एक वर्ग महिलाओं का ओर दूसरा वर्ग आज के युवा का फिर वो लड़की हो या लड़का। ये परम्पराएं दोनों ही वर्ग को उड़ने नहीं देती उनकी स्वतंत्रता छीन लेती हैं।

ठीक वैसे ही जब कोई युवा – चाहें वो लड़का हो या लड़की अपने परिवार से जब अपनी कोई भी ऐसी बात को जो उनकी परंपरा से मेल नहीं खाती है, को साझा करते है, उस क्षण वह संवाद केवल एक राय नहीं रह जाता है ,बल्कि वर्षों से चले आ रहे उन सामाजिक मानकों की परीक्षा बन जाता है, जिन्हें हम ‘सुंदरता’ या ‘शालीनता’ का नाम देते हैं।

अंततः, परंपरा का अर्थ केवल पुरानी लकीरों को ढोना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को बचाए रखना है जो हमें इंसानियत सिखाते हैं। जिस तरह एक पुराने घर की नींव वही रहती है, लेकिन हम उसके अंदर का माहौल अपनी आधुनिक जरूरतों के अनुसार बदल लेते हैं, ठीक वैसा ही तालमेल हमें अपने जीवन में भी चाहिए।जब हम परिवार के सामने अपनी बात रखते हैं, तो वह विद्रोह नहीं, बल्कि एक ‘नए पुल’ के निर्माण की शुरुआत होनी चाहिए। यह पुल ऐसा हो जो परंपरा के सम्मान और आधुनिकता की स्वतंत्रता को जोड़े। हमें यह समझने की जरूरत है कि परंपरा और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं।

क्या आप लोग भी मेरी इस बात से सहमत हो, कि हमें आज के दौर के हिसाब से अपनी परंपराओं में बदलाव लाना चाहिए।जो हमारी प्रगति में बाधा न बने।हमारे उस समुदाय के लिए जो इन परंपराओं का बोझ उठा रहे हैं।

आप अपने विचार को मेरे साथ साझा करें, ताकि हमें भी पता चले की जो हमारी सोच है वही आपकी,या फिर कुछ और।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

आप सभी का धन्यवाद कि आप मेरे आर्टिकल को पड़ रहे हैं।”मेरे प्रिय पाठकों, मैं समाज में बदलाव के इस सफर में आप सभी को शामिल करना चाहती हूँ। आप मुझे ईमानदारी से बताएं कि आपको मेरे आर्टिकल कैसे लग रहे हैं? क्या ये आपकी सोच में कोई बदलाव ला रहे हैं?”आपकी एक राय मुझे एक हौसला देगी अपने इस नए सफर में आगे बढ़ने का।

मजबूरी से मजबूती तक

एक छोटी सी कली जिसके आंखों में भी सपने थे, जो उड़ना चाहती थी,पूरे बगीचे में महकना चाहती थी,पर उसके खिलने से पहले ही किसी ने उसे तोड़ दिया।अक्सर यही हजारों कलियों के साथ होता हैं,लेकिन किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।

ऐसी बहुत सी कलियाँ होती हैं जो महकना चाहती है,पर वो खिलने से पहले ही मुरझा जाती है। ओर उनके मुरझाने की वजह होती हैं, मजबूरी। आखिर ये मजबूरी हमेशा कलियों के ही हिस्से में क्यों आती है ? क्या कोई इस बात पर विचार करेगा ।मुझे पता है यहां बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसा तो नहीं होता ,पर सच तो ये है की ज्यादातर यही होता है।

ओर इस मजबूरी की वजह से कलियों को कितना कुछ खोना पड़ता हैं,ये कभी किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की होती हैं। क्यो की लोगो को इस बात से कोई फर्क पड़ता भी नहीं,उन्हें बस अपने सोच,ओर अपनी राय ही अच्छी लगती है।

वो कली जो इस मजबूरी में अपनी किताबें,अपने सपने ,ओर यहां तक कि अपनी पहचान तक छोड़ देती ही। ओर इसके बाद भी मुस्करा रही होती है।क्यों की ये समाज उनको रोने का भी हक नहीं देता । कही कली के रोने से उनके बनाए झूठ की मालायें टूट कर न बिखर जाए ।चाहे फिर इन सब में एक या हजारों कलियों की जिंदगी ही क्यों न बिखर रही हो।

ऐसे हजारों ही उदाहरण है समाज में, जिनकी वजह से किसी न किसी कली की जिंदगी बिखरी होगी।शायद इस समय में हर घर में एक बिखरी कली मिल ही जाएगी।

यहां में किसी ओर का नहीं अपना ही उदाहरण ले रही हूं,मेरे साथ भी यही हो रहा था पिछले दस वर्षों से।अब जब हमें समझ आया ओर इसके खिलाफ आवाज उठायी तो मेरे ही चरित्र पर उँगली उठाने लगे मेरे अपने ही,जिनके लिए हमने अपने सपने ,अपना बचपन सब छोड़ दिया था, क्यों की मुझे भी यही कहा गया अभी मजबूरी समझो।आज वही अपने मुझसे बात तक करना पसंद नहीं करते ।

ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं बल्कि बहुत सी कलियाँ है, जो ये सब सह रही है ओर उसके बाद जब वो एक उम्मीद के साथ खुद के सपनों के लिए खड़ा होना चाहती है,फिर से खिलना चाहती है तो उनके चरित्र को हथियार बना कर उन पर बार किया जाता हैं।

पर ये कोई नहीं जानता है,कि अगर कोई भी लड़की मजबूरी में सब सह सकती है,तो सोचो उसने कितनी ताकत इकट्ठी की होगी उस मजबूरी ओर मजबूरी के पीछे छिपे डर से लड़ने के लिए।

उसने हर दिन अपने टूटते सपने ओर बिखरती जिंदगी को देखकर खुद को मजबूत बनाया होगा ।कि अब वो न तो किसी मजबूरी के सामने झुकेगी ओर न ही उसको दबाने के लिए उसके चरित्र पर लगाए गए आरोपों से रुकेगी।

यहीं से उस कली को मजबूरी से लड़ने की ताकत मिलती है,ओर एक दिन वो कली इन सभी मजबूरी को पीछे छोड़ मजबूती के साथ खिलेगी,ओर महकेगी ,फिर कोई भी उसको न तो तोड़ सकेगा और न ही मुरझाने पर मजबूर करेगा।क्यों कि कली अब पहले से मजबूत इतनी मजबूत अब वो अकेले नहीं खिलेगी ,बल्कि अपनी जैसी कलियों को साथ लेके खिलेगी।

वैसे भी यही समाज कहता है कि एक को झुकना थोड़ा आसान हो सकता हैं लेकिन एक साथ एक समूह को झुकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है,फिर उसके सामने समाज झुकता है।

आज का लेख अगर आपको अच्छा लगे ,लगे कि आप भी मेरे साथ खिलना चाहती है,तो कॉमेंट करके जरूर बताएं। आखिर हम भी देखना चाहते है मेरे साथ कितनी कलियां है,या कितने कलियों के परिजन है जो चाहते है उनकी कलियां खिले ओर महके इतना कि उनकी खुशबू से समाज बदल सके ।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

सुंदरता की परिभाषा: आखिर क्या।

आज हम आप सभी से कुछ जानना चाहते हैं, कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या है? इस सवाल का कोई जवाब देगा मुझे। क्यों की इस विषय पर आज हम कुछ कहना चाहते हैं, कि क्यों लोग ये समझ नहीं पाते की आखिर सुंदरता क्या है?

हम जिस समाज में रह रहे हैं उसमें बाहरी सुंदरता को इतना कीमती बना दिया गया कि हम अपनी असली सुंदरता को पहचानना ही नहीं चाहते, हमें लगता है कि बाहरी सुंदरता ही हमारे जीवन का आधार है।अगर हम बाहर से सुंदर और आकर्षित नहीं दिख रहे,इसका मतलब की हमारा जीवन ही बेकार है।

क्यों हम अपने ही शरीर से इतनी नफ़रत करने लगते हैं?क्या कभी किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है, क्यों हम एक ऐसे इंसान को देखकर खुद को कम आंकने लगते हैं, जो सिर्फ बाहरी सुंदर है। चाहें वो हर बात में हमसे बेहतर न हो, लेकिन हम फिर भी उसको देखकर खुद को कम समझ लेते है।

ओर ये सब कर के हम स्वयं के साथ कितना गलत कर रहे होते हैं ये हमें पता भी नहीं चलता।

आखिर अब सोचने वाली बात ये है कि हमारे दिमाग में ऐसा ख्याल आता कहां से, इसके लिए भी हमारा समाज ही जिम्मेदार है। क्यों की इसने हमें हर जगह ये बताया कि बाहरी सुंदरता ही सब कुछ होती हैं, जो दिखने में जितना ज्यादा सुंदर या आकर्षित है वह समाज की नजरों में सबसे बेहतर है।

हमें बचपन से ही ये सिखाया जाने लगता है,जब तक हम समझ सकते कि क्या सही क्या गलत , तब तक हम भी दिखावटी सुंदरता के लिए तुच्छ वस्तुओं में जकड़ जाते हैं।ये एहसास हमें जब होता है, हम खुद से ही नजर नहीं मिला पाते कि हमने बचपन से अब तक कितना गलत किया होता है अपने साथ।

क्यों हमें ये बताया नहीं जाता कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या होती है? हम उसको कैसे अपनाए । हम कैसे खुद को उसके काबिल बना सके । क्या कभी हम वास्तविक सुंदरता के बारे में विचार करते हैं,या किसी से इस बात पर चर्चा करते हैं। शायद सभी का जवाब न ही आयेगा।

क्यों हम ऐसा नहीं करते,जैसे हम बाहरी सुंदरता के लिए सभी से बात करेंगे कि हम कैसे खुद को इतना आकर्षित बना सके । पर कभी वास्तविक सुंदरता पर नहीं। तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या है?

वास्तविक सुंदरता किसी दूसरे की आंखों का मोहताज नहीं है। यह हमारे भीतर की वह शांति है जो तब महसूस होती है जब हम ‘दूसरों जैसे दिखने’ की दौड़ से बाहर निकलकर ‘खुद जैसा होने’ का साहस करते हैं। जिस दिन हम अपनी खामियों को अपनी ताकत मानना सीख जाएंगे, उस दिन हमें किसी से खुद की तुलना करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि असली सुंदरता सजना-संवरना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को गर्व के साथ गले लगाना है।”

जब भी हम खुद को आईना में देखें तो ये महसूस न करे कि हम बाहरी सुंदर है या नहीं, बस हमें स्वयं को देखकर ऐसा लगे कि क्या ताकत है हम में, जो दूसरों से कहीं ज्यादा सुन्दर ओर अलग बनाती है।हम जब भी खुद को देखें हमें खुद से ही प्रेम हो जाए। हमें ये महसूस न हो की कौन कितना आकर्षित है।

अंत में, वास्तविक सुंदरता का कोई पैमाना नहीं होता, क्योंकि यह कोई भौतिक वस्तु नहीं जिसे बाजार से खरीदा जा सके। यह हमारे भीतर की वह शांति है जो तब महसूस होती है जब हम ‘दूसरों जैसे दिखने’ की दौड़ से बाहर निकलकर ‘खुद जैसा होने’ का साहस करते हैं। जिस दिन हम अपनी खामियों को अपनी ताकत मानना सीख जाएंगे, उस दिन हमें किसी से तुलना करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। याद रखिए, असली सुंदरता सजना-संवरना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को गर्व और पूरे सम्मान के साथ गले लगाना है।”

अलविदा मेरे मित्रों फिर मिलेंगे एक नए विचार के साथ।

बंद कमरे से खुले आसमान तक, एक उम्मीद की किरण

आसमाँ तक…

एक चाहत, एक नीला आसमाँ। क्या हम सब इसे हर रोज़ नहीं देखते? क्या हम अपने अंदर उस एक आवाज़ को नहीं सुनते जो बार-बार पूछती है—”कब हम उस आसमाँ में उड़ेंगे?”

​हम लड़कियों की ज़िंदगी अक्सर एक बंद कमरे की खुली खिड़की से शुरू होती है। वही खिड़की हमें याद दिलाती है कि हमें इस कमरे से निकलना है, क्योंकि बाहर एक बहुत सुंदर जहाँ हमारा इंतज़ार कर रहा है। अक्सर होता यह है कि हम इसी दुनिया में आते हैं और चले जाते हैं, मगर उस खिड़की से बाहर निकलकर उस सुंदर नज़ारे को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

समाज की अनकही उलझनें

हम अपनी अनकही उलझनों में उलझे रहते हैं—कौन क्या कहेगा? लोग कैसे देखेंगे? सच तो यह है कि ये उलझनें हमारी नहीं, उस समाज की हैं जो हर कदम पर हमें यह दिखाना चाहता है कि हम सिर्फ एक कमरे में कैद होने के लिए पैदा हुई हैं। और इसमें सबसे मजेदार और दुखद बात यह है कि हमें यह सीख देने वाला अक्सर कोई पुरुष नहीं, बल्कि एक महिला ही होती है।

​हमें इतना बेबस महसूस कराया जाता है। हर पल याद दिलाया जाता है कि एक पुरुष के बिना हमारा जीवन, जीवन नहीं है। लेकिन मैं पूछती हूँ, क्यों? क्या हमारा वजूद सिर्फ किसी का सहारा लेने के लिए है?

बाज़ जैसा संघर्ष

हम उस घुटन भरी ज़िंदगी को जीना शुरू कर देते हैं, यह सोचकर कि “शायद यही मेरी ज़िंदगी है।” लेकिन हम उस आसमाँ को देखना बंद नहीं करते। हर रोज़ उस नीले आसमाँ को देखकर मन में एक नयी रोशनी जन्म लेती है। यह वही रोशनी है जो हमें अंदर से ताकत देती है—अपनों के खिलाफ लड़ने की और खुद के सपनों के लिए संघर्ष करने की।

​बिल्कुल उस बाज़ की तरह, जो बूढ़ा होने पर अपने ही दर्द सहते हुए अपने नखून तोड़ता है और भारी पंखों को अपनी चोंच से उखाड़ता है, ताकि वह नयी शक्ति के साथ फिर से सबसे ऊँची उड़ान भर सके। आज हर लड़की को वही दर्द सहना पड़ रहा है, अपनी पुरानी बेड़ियों को तोड़ने के लिए।

एक नयी उम्मीद की किरण

कभी-कभी लगता है कि सब खत्म हो गया, रास्ते बंद हैं। पर तभी अचानक कहीं से एक उम्मीद की किरण जागती है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। जब लगा कि चारों तरफ सिर्फ अंधेरा है, तब एक ऐसी आवाज़ ने मेरे कानों में गूँज की, जैसे किसी ने एक छोटी बच्ची को अपनी उंगली थमा दी हो। मुझे समझ आया—हम इतने कमज़ोर नहीं कि आसानी से हार मान लें।

​लेकिन, अगर बदलाव लाना है, तो पहले खुद में परिवर्तन लाना होगा। हमें समाज की उन पुरानी परंपराओं से आज़ाद होना होगा जिन्होंने हमें जकड़ रखा है। यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती। हमें इस उम्मीद की किरण को पूरा का पूरा सूरज बनाना होगा, तभी बदलाव आएगा।

मेरी पुकार

मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि जो कहानियाँ उन बंद कमरों में कैद रह जाती हैं, उन्हें आसमाँ तक पहुँचाना है। उन्हें उड़ान देनी है, उन्हें पंख देने हैं। मैं कौन हूँ? मैं वही हूँ जो आपके अंदर का वह हिस्सा है जो उड़ना चाहता है। मैं चाहती हूँ कि हर लड़की यह तय करे कि उसे बंद कमरे की खिड़की से दिखता थोड़ा सा आसमाँ चाहिए, या फिर बाहर निकलकर पूरा आसमाँ।

​क्या आप तैयार हैं इस लड़ाई में शामिल होने के लिए? क्या आप मेरे साथ मिलकर इस समाज की पुरानी सोच को बदलने के लिए तैयार हैं?

​चलिए, साथ मिलकर उड़ान भरते हैं।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

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“वह लड़की जो उड़ना चाहती थी”

🌸 हर दिन एक संघर्ष से जन्मी एक लड़की की कहानी
वो बहुत कुछ कहना चाहती थी, बहुत कुछ जीना चाहती थी, लेकिन ज़िम्मेदारियों ने उसकी उम्र से पहले ही उसे बड़ा बना दिया। बचपन में जहाँ सपने होते हैं, वहाँ उसके हाथों में घर की ज़िम्मेदारी थमा दी गई। पहले घर, फिर रिश्तों, फिर एक छोटे से बच्चे की जिम्मेदारी—और इस तरह उसकी उम्र बढ़ती रही, लेकिन उसके अपने सपनों की उम्र वहीं कहीं ठहर गई।
उसकी सहेलियाँ कॉलेज, करियर और आज़ादी के पल जी रही थीं, और वह घर के कामों और जिम्मेदारियों के बीच उलझी हुई थी। फिर भी उसके अंदर कहीं न कहीं एक आवाज़ थी—वो आवाज़ जो उसे बार-बार याद दिलाती थी कि वह सिर्फ ज़िम्मेदारी उठाने के लिए नहीं बनी, वह उड़ने के लिए भी बनी है।
कभी लगता था कि उसे पंख तो दिए गए हैं, लेकिन उड़ने की इजाज़त छीन ली गई है। फिर भी वह अंधेरे में भी आसमान देखती रही—एक नीला, खुला, और आज़ादी से भरा आसमान। वही आसमान उसकी उम्मीद बन गया था।
धीरे-धीरे उसने अपने सपनों को सहेजना शुरू किया। उसने सोचा कि वह कुछ बड़ा करना चाहती है—अपना खुद का बिज़नेस, अपनी पहचान, अपना एक नाम। लेकिन समाज ने उसके सामने हमेशा दो ही रास्ते रखे—या तो सरकारी नौकरी या फिर शादी।
मध्यवर्गीय समाज में अक्सर लड़कियों के लिए विकल्प बहुत सीमित कर दिए जाते हैं। पढ़ाई भी तब तक ही, जब तक घर की जिम्मेदारियाँ प्रभावित न हों। अगर कोई लड़की अपने सपनों के लिए आगे बढ़ना चाहे, तो उस पर सवाल उठने लगते हैं—उसके चरित्र पर, उसकी परवरिश पर, और उसके फैसलों पर।
उसकी कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। उसे भी यही समझाया गया कि शादी ही जीवन का अंत या शुरुआत है, और उसके बाद ही सब कुछ तय होगा। लेकिन उसने अंदर ही अंदर यह मान लिया था कि वह सिर्फ किसी की पत्नी या किसी के घर की जिम्मेदारी बनकर नहीं जीना चाहती।
वह दस साल तक अपने अंदर ही अंदर लड़ती रही—कभी पढ़ाई से, कभी जिम्मेदारियों से, कभी समाज की सोच से। उसने परीक्षाएँ दीं, कभी कुछ अंकों से रह गई, कभी शारीरिक परीक्षा में रुक गई। हर बार थोड़ा और टूटती, लेकिन फिर भी पूरी तरह हार नहीं मानती।
फिर एक दिन उसकी दुनिया बदल गई। उसकी माँ को गंभीर बीमारी हो गई। कैंसर, और वह भी तीसरे स्टेज में। अचानक उसकी पूरी ज़िंदगी एक ठहराव में आ गई। एक तरफ माँ की हालत और दूसरी तरफ उसके अपने सपने—दोनों के बीच वह खुद को खोती जा रही थी।
वह अपनी माँ को संभालती, उन्हें हिम्मत देती, उन्हें जीने की वजह समझाती, और खुद अंदर से टूटती जाती। रातों की नींद गायब हो गई, मन खाली हो गया, और सपने कहीं बहुत दूर चले गए।
लेकिन इसी अंधेरे में उसने खुद को फिर से पाया। उसने समझा कि जीवन सिर्फ हार या जीत नहीं है, बल्कि हर दिन एक नई लड़ाई है। और अगर वह खुद नहीं संभलेगी, तो कोई और उसके सपनों को नहीं समझेगा।
धीरे-धीरे उसके अंदर एक नई रोशनी जगी। एक उम्मीद की किरण, जो कह रही थी—“अभी सब खत्म नहीं हुआ है।”
उसे एहसास हुआ कि बदलाव पहले खुद से शुरू होता है। अगर उसे अपने जीवन की दिशा बदलनी है, तो पहले उसे अपनी सोच और अपने डर से लड़ना होगा। समाज को बदलने से पहले उसे खुद को आज़ाद करना होगा।
वह जानती थी कि यह रास्ता आसान नहीं होगा। परिवार, समाज और जिम्मेदारियाँ—सब एक साथ उसके सामने खड़े थे। लेकिन अब उसके अंदर डर नहीं था, अब उसके अंदर एक जिद थी—अपनी पहचान बनाने की।
उसने तय किया कि वह अपने सपनों को नहीं छोड़ेगी। वह अपना खुद का व्यवसाय शुरू करेगी, अपनी एक पहचान बनाएगी। वह सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं जिएगी, बल्कि अपने लिए भी जिएगी।
और वह जानती थी कि वह अकेली नहीं है। उसके जैसी हजारों लड़कियाँ हैं, जो हर दिन इस संघर्ष से गुजरती हैं—कहीं चुपचाप टूटती हैं, तो कहीं चुपचाप खुद को फिर से जोड़ती हैं।
यह कहानी सिर्फ उसकी नहीं थी, यह हर उस लड़की की कहानी थी जो अपने अंदर एक आसमान लिए बैठी है, लेकिन उड़ने के लिए पंखों की तलाश में है।
अब वह कहती है—
“मैं अब सिर्फ जीना नहीं चाहती, मैं उड़ना चाहती हूँ। और मुझे पता है कि एक दिन मैं इस आसमान को अपना बना लूँगी।”
✨ और यही उसकी कहानी का नया अध्याय था—जहाँ संघर्ष खत्म नहीं हुआ, लेकिन उम्मीद ने जीतना शुरू कर दिया।

एक यात्रा ऐसी भी

यात्राएं आखिर ये करना क्यों जरूरी होता हैं कभी किसी ने सोचा क्या ? अगर आप में से किसी ने कभी इस विषय पर विचार नहीं किया तो करना ,ओर पूछना अपने आप से क्यों हम कही अचानक से किसी यात्रा पर जाना चाहते हैं, या क्यों हम यात्रा करते हैं।शायद यहां कुछ लोग इस बात को पढ़ कर ये सोचेंगे की आखिर हम अपने आर्टिकल में यही सबसे पहले क्यों पूछ रहे है।

एक यात्रा ऐसी भी

तो चलिये हम आपको यात्रा के बारे में कुछ बताते हैं।आखिर क्यों हम यात्रा करना चाहते है, क्यों कि हमारा जीवन ही एक यात्रा है जिसकी शुरुआत उस दिन से हो जाती हैं जिस दिन हमने इस दुनिया में अपनी पहेली साँस ली थी,पर जब भी यात्रा शब्द कही दिखता है या हम सुनते हैं तो हमारे मन में सबसे पहला ख्याल यही आता है की चलो कही बाहर घूम आते हैं, पर ये उनके लिए ही होता है जिन्हें आजादी मिली होती हैं कहीं भी आने जाने की, अधिकांश लोग इससे वंचित रह जाते हैं। लेकिन ये कोई भी नहीं जानता है या जानना नहीं चाहता है कि यात्रा तो हर इंसान कर रहा है अपने जीवन में , चाहें उसके संघर्ष हो या किसी ओर तरह की लड़ाई, हम क्यों नहीं ये देखना चाहते है कि इस दुनियां में हर इंसान अपनी एक अलग ही यात्रा पर निकला है। अगर बात हम अपनी यात्रा की करें तो मेरी यात्रा तो अभी उस संघर्ष में है जहां लोग अक्सर हार ही जाते है ओर वो संघर्ष जब अपनो से होता हैं, हम भी उसी में फसे हुए हैं देखते है आखिर हम अपनी इस यात्रा को पूरा करते हैं या रुक जाएंगे। मेरी ही तरह बहुत से लोग इसमें फसे हुए हैं।

आखिरकार ये यात्रा शुरू कहां से हुई क्यों सब इसमें ही आकर फस जाते हैं? तो इसका जवाब भी जान लो जो शुरू होती हैं समाज की रूढ़िबादी सोच से,इसमें ऐसा नहीं कि सिर्फ एक ही वर्ग यात्रा कर रहा हो,इसमें तो हर वर्ग के लोग फसे हुये है।

यात्रा का सिर्फ यही मतलब नहीं होता की किसी एक स्थान से दूसरे स्थान तक, वो भी कुछ चुनिंदा स्थानों पर जाना । इसको यात्रा कहना तो ठीक नहीं है क्यों की यात्रा तो वो है जो हमें जीने का एक नजरिया देती है ओर वो यात्रा बाहरी भी हो सकती है ओर आंतरिक भी , अब यहां ये आंतरिक यात्रा का जिक्र इसलिए किया है कि अगर हम अपनी ही आंतरिक यात्रा नहीं कर पाए तो हम वो कभी भी नहीं बन पाएंगे जो हम है।फिर तो हम सिर्फ एक कठपुतली बन कर ही जीवन जिएंगे। क्या हमें ये मंजूर है , कि हम अपना जीवन सिर्फ दूसरों की कठपुतली बन कर ही निकाल दें?

हमारी सबसे कठिन यात्रा ही हमारी आंतरिक यात्रा होती है अगर इसको पूरा कर लिया तो हम अपनी उस मंजिल तक पहुंच जाएंगे जिसके लिए हम सब इस संसार में आए हैं,पर हम कभी इस यात्रा को करना ही नहीं चाहते । हम तो सिर्फ यात्रा के नाम पर कुछ सीमित जगहों पर चले जाते,हम इस यात्रा को भी सच्चाई से नहीं करते कि हम अगर यात्रा पर निकले हैं तो एक ऐसी यात्रा करे जो हमारे जीवन में कुछ बदलाव लाये , ओर उस बदलाव से हम किसी ओर के जीवन को बेहतर बना सके ।

क्यों कि इस समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो यात्रा तो करना चाहते है,पर उन्हें उसकी आजादी नहीं है,ऐसा ज्यादातर महिलाओं के साथ ही होता हैं।अगर वो यात्रा करने की सोचती भी है तो समाज की रूढ़िबादी सोच उनके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं, क्यों इस समाज में आखिर उनके लिए इतने सीमित सीमाएँ बनाई है।

जहां तक बात रही आंतरिक यात्रा की तो उसको करने के लिए भी ज्ञान की जरूरत होती है।उसके लिए भी सीमित सीमाएँ बना दी गई है, कितना पढ़ना है कब तक पढ़ना है,क्या पढ़ना है। जब तक हमें ज्ञान ही नहीं होगा कि क्या सही है क्या गलत तब तक हम आंतरिक यात्रा भी नहीं कर पाएं ।

ये ठीक वैसे ही है जैसे एक गोताखोर को अगर पता न हो की, समुद्र की गहराई कितनी है, तो क्या वो उतना गोता लगा पाएगा।

इस लिए हमें अपनी आंतरिक यात्रा के लिए ज्ञान चाहिए , चाहें फिर वो समाज का काेई भी वर्ग क्यों न हो। यात्राएँ चाहें आंतरिक हो या बाहरी ,लेकिन अगर कोई भी कर ली न तो इस समाज में बदलाव आना शुरू हो जाएगा । जिसकी जरूरत समाज को अभी बहुत है,इस लिए यात्रा करना शुरू कर दो, जिस प्रकार की भी यात्रा करो बस शुरू कर दो।जिससे जो समाज की रूढ़िबादी सोच में जकड़े हुए लोग हैं उन्हें आजादी दिला सको,इस समाज से ।

क्या आप मेरा इस यात्रा में साथ दोगे ? अगर देना चाहते हो तो आज से ही अपनी यात्रा शुरू कर दो ।फिर वह आंतरिक हो,या बाहरी।

चलिए एक नई यात्रा की शुरुआत करते हैं हम सब मिल कर ।

“मैं होकर भी मैं नहीं: एक अधूरा सफर”

दो सफर _

पता नहीं क्यूं आज अचानक ऐसा महसूस हुआ कि हम एक साथ 2 सफ़र पर निकले हो, कभी तो कुछ कहने का मन करता तो कभी शांत रहने का फिर भी खुद को समझ न पाए कि आखिर हम चाहते क्या है लेकिन इसका क्या फायदा कि हमें क्या चाहिए हम तो करेंगे वही जो समाज हमसे कराना चाहता है या यूं कहे कि जो हमारे अपने हमसे चाहते हो यही सोचते _ सोचते कब सुबह से शाम हो गई पता ही नहीं चला। फिर उठ कर खुद को आईना में देखा ओर पाया कि हम अकेले हैं नहीं सामने आईना में दो लोग नजर आए एक वो जो हम खुद है ओर दूसरी वो जो समाज के या घर बालों के दवाब में आकर बनी तब समझ आया कि हम एक साथ दो सफर में चल रहे हैं। फिर याद आया कि हम जो स्वयं है वो तो कहीं खो सी गई है,ओर जो सभी के सामने नजर आती हैं वो तो हम है ही नहीं पता नहीं क्यूं हम होकर भी हम नहीं हैं।ओर ये दोहरा सफर जो अब एक घुटन बनता जा रहा है कब तक चलेगा कुछ नहीं पता लेकिन एक बात तो साफ है जो 2 नाव पर सवार होते है वो हमेशा डूबते हैं मुझे भी पता अगर एक सफर नहीं चुना तो मेरी नाव भी जल्दी डूबेगी। अब बात आती है आखिर कौन सा सफर चुने, वो जो हम है या वो जो हमें बना दिया गया है। आखिर क्यों इतना मुश्किल हो जाता है अपने लिए खड़े होना क्यों हम हमेशा बेड़ियाँ ही चुनते हैं अपनी स्वेक्षा से न सही किसी के दबाव में आकर ही सही पर हम अपने लिए पिंजरा चुन ही लेते है ।

आत्मविश्वास की कमी

जरा देखो खुद को क्या हो तुम क्या यही हो तुम या कुछ ओर ये सवाल पूछा जब खुद से तो आईना में खड़ी दूसरी तरफ वो में जो में स्वयं हूँ से जवाब आया में तो यही हूं पर सवाल करने बाली कोई ओर है ओर जो सवाल कर रही उससे अगर पूछा जाए की आखिर तुम कौन हो तो जवाब आयेगा टूटे हुए सपने , बिखरा हुआ चरित्र ओर कहीं खोया हुआ आत्मविश्वास जो है ही नहीं क्या यही हूं में।आखिर क्यों मेरे पास आत्मविश्वास नहीं है क्यों हमें एक सहारा चाहिये। सहारे की जरूरत भी उन्हें ही होती हैं जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती हैं जिन्हें हमेशा एक उंगली चाहिए होती हैं जिसे पकड़ कर अपना सफर तय कर सके ,पर ऐसे लोग ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहते हैं क्यों की मर तो वो पहले ही चुके हैं बस अब सिर्फ शरीर बचा होता हैं। ये सिर्फ मेरी ही बात नहीं ये हर उस लड़की की कहानी है जो दो सफर में चल देती हैं किसी न किसी परिस्थिति की वजह से ।

आखिर क्यों हमें इतना भी हक नहीं दिया जाता की हम ये तय कर सके की हम किस एक सफर पर चलना चाहते हैं। क्या यही जीवन होता है,क्या इसे ऐसे जीने के लिए हम आए हैं इस संसार में, वो संसार जो इतना बड़ा ओर सुंदर भी है जिसे हम देखे बिना ही चले जाएंगे ,हमें तो पता भी नहीं चलेगा कि जहां हम है उसके आगे एक सुंदर संसार है जिसमें बहुत कुछ देखने ओर सीखने के लायक भी है,लेकिन हमारी जिंदगी की सीमाएं तय कर दी जाती है जिसके आगे का हमें पता हीं नहीं चलता की कुछ ऐसा भी है अगर हमें मिल गया तो हम शायद ही किसी के हाथ आए हम भी खुद से चल सकेंगे नहीं चाहिए किसी ओर का सहारा हमें लेकिन हमें इस मूल्यवान ओर कीमती चीजों से दूर रखा जाता हैं हमें इतना जकड़ दिया जाता है तुच्छ वस्तुओं से की हम ऊपर उठ कर देख ही नहीं पाते ।।

तुच्छ वस्तुओं से प्रेम

आखिर इतना प्रेम तुच्छ वस्तुओं से क्यों हमारे लिए ये इतनी मूल्यवान वन जाती हैं, क्यों हम इन में अपना जीवन ओर अपनी आजादी कुर्बान कर देते है क्यों,इसका जवाब मिला की हमें बताया ही यही जाता है की ये इतनी मूल्यवान है कि उसके लिए हमें अपनी आजादी कुर्बान करनी होगी तभी हमें मिलेंगी, ये बताना बाला कोई ओर नहीं बल्कि अपने ही होते है ओर हमें लगता है अगर अपने कह रहे तो सही कह रहे हैं ओर हम अपनी आजादी कुर्बान कर देते हैं इन तुच्छ वस्तुओं के लिए । क्यों की हमें बताया ही नहीं जाता कि इससे भी मूल्यवान ओर कीमती चीजें है दुनिया में जो अगर पा लिया तो जीवन ही , सोच ही बदल जाएगी ओर शायद किसी के दवाब में न आए हम किसी से डरे भी नहीं ओर किसी के सामने झुके भी नहीं, इस लिए ये तुच्छ वस्तुओं को इतना कीमती बना दिया जाता हैं की हम असली मूल्यवान चीज़ों को पाने के बारे में सोचते भी नहीं ।

हमें समझना होगा ओर जानना होगा की क्या हमारे लिए जरूरी है ओर क्या हमें जकड़ रही है।ये बात वो खुद को समझा रही थी जो वो खुद है न की वो जो समाज ने उसे बनाया है,उसे समझना होगा की वो एक सफर तय करे ओर वो सफर वो खुद का हो , आत्मचिंतन का हो,आत्मज्ञान का हो ओर अपनी असली पहचान का हो न की किसी बाहरी दबाव से जन्मी पहचान का हो।खुद के लिए लड़ो अगर नहीं लड़े नहीं खड़े हुए तो इसे ही नकली पहचान ओर सीमित सफर तय कर पाओगी । कभी भी असली मंजिल तक नहीं पहुंच पाओगी।

अपनी खोज कीजिए और मिलिये उस शख़्स से जो तुम्हारा अपना सबसे बेहतर दोस्त/मित्र है। अपनी असली पहचान से मिलिए।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों फिर जल्द मिलेंगे।

टूट कर फिर सम्भल कर उड़ने की अनकही कहानी

अनकही बाते

आज इतनी घायल है चिड़िया की समझ में ही नहीं आ रहा कि क्या कहे क्या न कहे इतनी घायल वो भी मन से तन से तो तब भी एक बार घायल चिड़िया लड़ सकती है पर मन से घायल कैसे खुद को समझाए पता ही नहीं क्या कहे क्या न कहे खुद से कुछ पता ही नहीं ।

उसको घायल किसी ओर ने नहीं अपनो ने ही किया यही तो उसकी सबसे बड़ी चोट है ।था चिड़िया कोई ओर नहीं बल्कि एक लड़की है जो बाहरी लोगों से लड़ती है लेकिन आज उसके सामने उसके अपने आ गए। अब उसको यही समझ नहीं आ रहा कि अपनो से कैसे लड़े ।कैसे उनको बताए कि कितने दर्द में है वो।

अपनो का दिया दर्द या धोखा _

आज उस चिड़िया के अपनो ने ही इतना दर्द दे दिया कि नही समझ पा रही क्या करे क्या न करे ।क्यों आखिर ऐसी जिंदगी होती है मध्यम वर्गीय समाज की लड़कियों की उसको सारी जिन्दगी लड़ना ही पड़ता है अगर वो अपने लिए कुछ करना चाहती है तो पहले बाहरी लोगों से फिर अपनो से ?बाहरी तो एक बार लड़ भी लो अपनो से कैसे वो अपने जिनके लिए उसने अपने ही सपनों को पीछे रख दिया हो कि अरे अभी तो इनको जरूरत है मेरी ,फिर वही अपने उसके सामने आकर खड़े हो जाते हैं जैसे ही वो अपने बारे में सोचना शुरू करती है पता नहीं क्यों उन्हें हमेशा भी चाहिए जो उनके ही हिसाब से चले कभी भी अपनी आवाज न सुने ।ओर जब वो अपनी सुनती है तो वहीं अपने उसके सामने आकर खड़े हो जाते हैं ये देख कर कितना दर्द होता है ये उस चिड़िया से पूछो कितना तड़पती है कि ये वही है जिनके लिए इतना किया अपने वो समय उन्हें दे दिया जो उसकी जिंदगी का सबसे अनमोल समय था ।ये धोखा उसे मानसिक कितना तोड़ता है ये कोई सोच भी नहीं सकता ।

क्यों सिर्फ शादी ही जिंदगी का केंद्र बिंदु बना दी जाती है क्यों कोई नहीं समझता कि लड़की है तो क्या इसके कोई बड़े सपने नहीं हो सकते क्या ये उड़ नहीं सकती या उड़ना नहीं चाहती है।ऐसा क्यों आखिर मध्यम वर्गीय परिवार में होता है ? पता नहीं क्यों उसको उसकी ही जिंदगी का विलन बना दिया जाता है।उसे बताया जाता है यह उसने उनकी नहीं सुनी इसी वजह से उसके साथ ऐसा हुआ अगर उनके खे अनुसार चलती तो ऐसा नहीं होता ।उसने मना क्या किया शादी करने से उसको चरित्रहीन बना दिया ओर ये सब कहने वाले कोई ओर नहीं बल्कि उसके अपने ही है उसे इतना दबा रहे कि वह घुटन में आकर बस शादी को है कर दे ।क्यों नहीं समझ ते ये लोग सिर्फ शादी ही जीवन का सत्य नहीं है इसके अलावा भी ओर सत्य है जो शादी से कही अधिक महत्वपूर्ण है

चरित्र को आंकना _

चिड़िया के चरित्र को लोग ऐसे आंकते है कि जैसे कोई इंसान नहीं बल्कि कोई वस्तु है अगर उसको शोरुम में रखे दिन हो गये इसका मतलब लोग सीधे ये लगाते हैं कि उसमें कोई कमी होगी कोई उसके पीछे की वजह नहीं जानता शायद वो लिमिटिड कलेक्शन ही हो ,पर नहीं उसको जानने की कोशिश नहीं करेगा कोई सिर्फ उसको लंबे समय से वही रखा देखेगा तो उसमें कमी निकलेगा ।ठीक इसी तरह अगर कोई लड़की 26 वर्ष या 27 वर्ष की है ओर शादी के लिए मना कर रही तो इसके पीछे की वजह नहीं जाननी बस उसके चरित्र को गलत मान लेना ओर उसको हर जगह बदनाम करने लगना यही सच्चाई है।

दर्द से लेकर उड़ने की आशा ना छोड़ना_

उस चिड़िया ने भी ठान रखी है चाहे कितना भी दर्द शहन करना पड़े पर उड़ना तो है ओर उड़ कर रहेंगे यही उसकी एक परम् सच्चाई है।चाहे कितना भी लोग या उसके अपने उसके सामने आकर खड़े हो जाये पर वो झुकेगी नहीं ,क्यों कि उसको पता है उसने कितना कुछ सहा ये सिर्फ ये उम्मीद में की एक दिन वो अपने सपनों को पूरा करेगी । एक दिन आसमान में उड़ेगी । यही उम्मीद उसे इस समय के चारों तरफ छाए घोर अंधेरे से निकलने में मदद करेगी।कही तो एक दरवाजा जो उसके इस अंधेरे से निकलने के लिए खुला होगा या खुलेगा जिस तक उसको पहुंचना है।जिस दिन वो इस दरबाजे तक पहुंच गई वो इतना ऊँचा उड़ेगी कि फिर कभी किसी की कैद में न आएगी।

ओर अंत में आज आप सभी से एक सवाल है क्यों आखिर ये समाज उस चिड़िया पर इतनी पाबंदी लगाना चाहता है क्यों नहीं समझता कि वो भी तो एक जीती जगती इंसान है न कि कोई वस्तु । क्यों इसी हजारों चिड़ियों को अपने सपने के लिए अपनो से ही लड़ना पड़ता है ये वो अपने जो उसे कहते तो अपना ही है पर उसके पीछे ही उसे बदनाम करते हैं,क्यों किसी लड़की की उड़ान में उसके चरित्र को बीच में ल दिया जाता है ऐसे ही उसको उड़ने से रोका जाता है।आखिर क्यों ?उसको क्यों अपने सपनों ओर अपने चरित्र में से एक को चुनने पर मजबूर कर दिया जाता है ओर अंत में थकी हुई लड़की अपने चरित्र को छोड़कर सपने को चुन लेती है अगर तो उसको ओर कई तरीकों से तोड़ने की कोशिश की जाती है।

आखिर क्यों उसके लिए इतनी सीमाएं तय कर दी गई है। ओर उसको अधिकार सिर्फ क्या अगर कुछ करना है तो सरकारी नौकरी करो नहीं तो शादी ये सीमाएं आखिर क्यों?

लेकिन कुछ भी के लो चाहे समाज हो या खुद उस चिड़िया के अपने ही ,पर वो उड़ेगी क्यों कि उसको पता है अगर उसने ये नहीं किया तो उसके जैसी ओर हजारों चिड़ियाँ है जो कभी नहीं उड़ पाएंगी किसी को तो ये नियम तोड़ने होंगे तो ये शुरुआत वो चिड़िया खुद ही करेगी अब किसी ओर के भरोसे नहीं बैठना कोई नहीं आने वाला उसको उड़ान देने के लिए जब उसके खिलाफ उसके अपने ही आ गए हो तो किसी ओर से नहीं आप e आप से उम्मीद करो ।

अलविदा मेरे मित्रों आज के लिए ओर हां जो सवाल किया है उसका जवाब जरूर देना ।